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सफलता के लिए धैर्य क्यों जरूरी है? SAFALTA KE LIYE DHAIRYA

SAFALTA KE LIYE DHAIRYA

एक प्राचीन कथा आज भी हमारे उलझन भरे जीवन प्रबंधन के लिए सर्वोच्‍च नैतिक शिक्षा प्रदान कर सकती है। यह प्रेरणादायक कहानी है एक राजा, एक नर्तकी, और एक ऐसे दोहे की, जिसने पूरे दरबार में उपस्थित दरबारियों का जीवन बदल दिया। यह सिर्फ एक राजा की कहानी नहीं है, अपितु आत्म-ज्ञान की कहानी है जो सिखाती है कि कैसे तबला वादक की सीखयुवराज का धैर्य, और राजकुमारी की बुद्धिमानी एक ही क्षण में सबके समक्ष प्रकट हो कर सदमार्ग पर चल पडा।इस कहानी में हम समझेंगे कि कैसे गुरु का वैराग्य और अंततः नर्तकी का त्याग हमें सफलता के लिए धैर्य का महत्व समझाता है, और हमें सिखाता है कि वास्तविक जीवन का सार क्या है।

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एक पुरानी कथा है जो वर्तमान समय में  भी बिल्कुल तर्क संगत है।

एक राजा था ।राजा को राज भोगते हुए बहुत समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । राजा ने एक दिन अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने कुलगुरु एवं मित्र देश के राजाओं को भी आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक और रंगीन बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं। ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । पूरी रात नाच गान चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबला बजाने वाला ऊँघ रहा है ।और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है, नही तो राजा का क्या भरोसा । नाराज हो जाए और दंड दे । इसलिए तबला वादक को जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा बोला

बहुत बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताए। 

एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए ।।

अब इस दोहे का कमाल देखिये । इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने कर्तव्यों के अनुसार अर्थ निकाला ।

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तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा । यही दोहा  गुरु जी ने सुना तो गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को  अर्पण कर  दीं ।

दोहा सुनते ही राजा की लड़की ने  भी अपना नौलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया ।

दोहा सुनते ही राजा के पुत्र युवराज ने भी अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।

ये सब देखकर राजा बहुत ही अचिम्भित हो गया । सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है ।

 पर यह क्या! अचानक एक दोहे से सब  अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुशी से  नर्तिकी को समर्पित कर रहें हैं।

जब यह बात राजा के कुलगुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे – “राजा ! इसको नीच नर्तिकी  मत कहो, क्योंकि इसने दोहे से सभी की आँखें खोल दी हैं । दोहे से यह कह रही है कि "मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ," महाराज  ! इसने बड़ा अनर्थ होने से मुझे बचा लिया।मैं तो अब चलता हूं ।

यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े। 

राजा की लड़की ने कहा – “पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी विवाह नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?”


युवराज ने कहा – “पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना चाहता था । लेकिन इस नर्तकी के दोहे ने समझाया कि अरे पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।” 

जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैंसला लिया – “क्यों न मैं आज अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।

फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा – “पुत्री ! दरबार में आस पास के राज्‍याेे से एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रूप में चुन सकती हो ।” राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।


यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा -मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?”

उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा नृत्य  बन्द करती हूँ और कहा कि हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करूँगी । 

याद रहे आपके निरंतर प्रयासों  के उपरान्‍त भी आपके इच्‍छा अनुरूप परिणाम  नही  मिल रहा हो कुछ ऐसा कार्य ना करे जो अपके जीवन में कलंक लगा दे ।धैर्य न खोए।थोडा देर से ही स‍ही लेकिन मेहनत का उचित फल अवश्‍य मिलता हैै।

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 उपरोक्‍त प्राचीन कथा केवल एक मनोरंजक राजा की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीवन प्रबंधन से संबंधित नैतिक शिक्षा है। इस प्रेरणादायक कहानी का जीवन का सार है कि हर व्यक्ति को अपने समय के प्रति सतर्क रहना चाहिए, जिस तरह से तबला वादक की सीख और गुरु का वैराग्य प्रकटहैं। युवराज का धैर्य और राजकुमारी की बुद्धिमानी  सिखाती है कि सफलता के लिए धैर्य कितना आवश्यक है और कैसे एक पल भर का आवेग पूरे जीवन पर कलंकित कर सकता है। अंत में, नर्तकी का एक दोहा इस आत्म-ज्ञान की कहानी में लोगों का विचार बदल देता है, यह साबित करता है कि सुधार और वैराग्य किसी भी पल संभव है। इसलिए, याद रखें: अधीरता छोड़ें, अपने लक्ष्य को केंद्रित करें, और आपको विलंब से ही सही, लेकिन मेहनत का उचित फल अवश्य मिलेगा।


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